Thursday, 23 April 2020

जब भी घर से निकलता हूंँ मन भर जाता है आंँशु बहुत होते हैं पर कुछ पल रोक पाता हूंँँ

जब भी घर से निकलता हूंँ, मन भर जाता है।

  आँशु बहुत होते है, पर कुछ पल  रोक पाता हुँ।।

 मैं ..मे आप सभी है

जब भी घर से निकलता हुँ,मन भर जाता है ।
आँशु बहुत होते हैं ,पर कुछ पल रोक पाता हुँ।।

जो खुद ही जाकर रोते हैं, अकेले में।
 माँ- बाप समझाते हैं ,घर के आंगन के किसी कोने में।।

 वो सब भी  कहते हैं ,अच्छे से जाना ।
मुँह फेर के फिर ,आंँशु ना बहाना । ।

जब भी घर से निकलता हूँ ,मन भर जाता है ।
आंँशु बहुत होते हैं ,पर कुछ पल रोक पाता हुँ ।।

वो पड़ोसी चाचा -चाची बहुत समझाते हैं।
 जाने के बाद एक बार याद कर लेना, ये सब हमें बतलाते हैं ।।

हांँ जब भी घर से निकलता हूंँ, मन भर जाता है ।
आँशु बहुत होते हैं ,पर कुछ पल रोक पाता हूंँ।।

हमने भी आंँशुओ के घड़े (मटका)थामें रखे हैं।
निकलते हैं घर से बाहर, और खुद ही बह जाते हैं।।

 हम पढ़े-लिखे या नौकरी करे ,जब भी घर से दूर जाते हैं।
 ये घर छोड़ने के एहसास हमें बड़े रुलाते हैं ।।

हाँ  जब भी घर से निकलता हूँ ,मन भर जाता है ।
आँ शु बहुत होते हैं , पर कुछ पल  रोक पाता हुँ।।

हम भी कितना समझाए उनको ,जो पल भर नहीं छोड़ते थे ,मांँ  का आंँचल ,अब वो वर्षों तक घर नहीं आते हैं ।।

 क्या बीतती होगी उस मां पे, जब उसके आंँखों के मोती, हर दिन ऐसे ही बह जाते होंगे।।

 जब भी घर से निकलता हूंँ , मन भर जाता है ।
आंँशु बहुत होते हैं, पर कुछ पल रोक पाता हूंँ ।।

मैं जिंदगी में बड़ा समझदार हो गया हूंँ ।
 जब भी घर से निकलता हूंँ , पर आँशुओं को रोक नहीं पाता हूँ ।।

हां जब घर से निकलता हूँ, मन भर जाता है ।
आँशु बहुत होते हैं ,पर कुछ पल रोक पाता हूँ ।।

वो गांवो की गलियाँ भी अब ,सपनो में बहुत रुलाती है
जब भी सोकर उठता हूंँ ,उनसे अपने -आप को बहुत दूर पाता हूंँ ।
तुम सबको मैं याद करता हूँ ।।

 हां जब भी घर से निकलता हूंँ, मन भर जाता है।
आँशु बहुत होते हैं ,पर कुछ पल रोक पाता हूंँ।।

 जब भी बात करता हूंँ , अच्छा हूंँ,  कहकर झुटलाता हूंँ । परेशानियां बहुत हैं ,पर हकीकत नहीं बतलाता हूंँ।।

 हां जब भी घर से निकलता हूंँ, मन भर जाता है ।
आँशु बहुत होते हैं ,पर कुछ पल रोक पाता हूं ।।

इस तंग जिंदगी ने हमें ,बहुत तोड़ दिया है।
 इस तंग जिंदगी ने हमें ,बहुत तोड़ दिया है ।।
हमने इसके खातिर कहीं अपनों को दूर छोड़ दिया है।।

हां जब भी घर से निकलता हूंँ, मन भर जाता है ।
आँशु बहुत होते हैं पर कुछ पल रोक पाता हूंँ ।

वो  दादा-दादी छोटे भाई बहन सब सपनों में है,
 हकीकत में कहां देख पाता हूंँ ।
फिर भी हर दिन तुम सबको मैं याद करता हूंँ।।

जब भी घर से निकलता हूंँ, मन भर जाता है ।
आँशु बहुत होते हैं पर कुछ पल रोक पाता हुँ ।।
...दिलीप पवार
Dileep pawar

No comments:

Post a Comment